वृद्धाश्रम

वृद्धाश्रम 


वरुण एक विदेशी कंपनी में बतौर मैनेजर काम करता था।  अच्छी खासी सैलरी पैकेज थी।  कंपनी साल में  एक बार पूरी फैमिली को अपने खर्चे पर किसी खास जगह पर घुमाने ले जाती थी।  हफ्ते दिन तक परिवार के साथ घर से बाहर समय बिताने के बाद वापस फिर घर आता था।  ये प्रक्रिया साल दर साल चलता था।  

शादी के काफी दिन बीत जाने के बाद जब वरुण के माता पिता को कोई औलाद नहीं हुआ तो वे कई मन्नतें मांगी, व्रत रखा, दान दिए, सैकड़ो गरीबों को खाना खिलाया, तब जाकर वरुण पैदा हुआ।  जब वरुण पैदा हुआ तब उसके पिता ने काफी पैसे खर्च किये अपने दफ्तर से लेकर अपने मोहल्ले में सब को मिठाई खिलाया।  वरुण को पा कर उसके पिता मोहन और माँ  रमा काफी खुश थे।  वे फुले नहीं समा रहे थे।  कई दिनों तक घर में रिश्तेदारों का आना जाना लगा रहता था।  घर में उपहारों की ढेर लग गयी थी। सारा घर उपहारों से भरा पड़ा था। वरुण के दादा दादी भी बहुत खुश थे।  आखिर घर में नया चिराग जो आया था। दादा दादी अब अपना ज्यादा से ज्यादा समय अपने पोते वरुण को खिलाने और उसके देख रेख में रहते थे। वैसे दादा को अपने बेटे से ज्यादा पोता प्यारा होता है।  दादा  जब भी घर से बाहर जाते थे कुछ न कुछ अपने पोते के लिए खरीद कर लाते थे।  कभी खिलौना तो कभी मिठाई।  वरुण भी अपने दादा दादी का आदि बन गया था। समय बीतते गया और वरुण बड़ा होता गया।  अब धीरे धीरे स्कूल जाने लगा था। वरुण के दादाजी की तबियत अचानक से बिगड़ी और वो चल बसे।  फिर धीरे धीरे वरुण की दादी की भी तबियत बिगड़ने लगी और वो एक दिन चल बसीं।  अब वरुण को खिलाने वाला नहीं था।  खैर, समय के साथ साथ वरुण बड़ा होता गया और पढाई करने लगा।  

उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए वरुण को विदेश भेजा गया जहां वह एक प्रोफेशनल कोर्स किया और फिर उसी संस्थान से उसको नौकरी भी मिल गयी।  शुरुवाती समय में उसको थोड़ी बहुत सैलरी मिलती थी।  लेकिन धीरे धीरे उस कंपनी में अनुभव होने के कारण वरुण को पदोन्नति मिलती गयी और वो उस कंपनी में एक अच्छे मुकाम पर पहुंच गया जहां उसे अच्छी खासी सैलरी और साथ साथ बहुत सारे भत्ते भी मिलते थे। 

वरुण के कंपनी में काम करने वाली एक लड़की राधिका से प्यार हुआ और कुछ दिनों के बाद दोनों ने शादी कर ली।  शादी के बाद वरुण की पत्नी के सामने ये प्रस्ताव रखा गया की वो अपने सास ससुर की देख रेख करे और उनकी सेवा करे। कुछ दिनों तक सब कुछ तो ठीक ठाक चला लेकिन उसके बाद घर में आपसी कलह शुरू हो गयी थी क्यूंकि वरुण की बीवी राधिका को गाँव की रीति रिवाज और वहाँ का माहौल से उसको कुछ लेना नहीं था वहाँ के हिसाब से अपने आप को ढाल नहीं पा रही थी।  कुछ दिन के बाद से गाँव में उसे घुटन सी महसूस होने लगी और वो भी शहर जाकर नौकरी करना चाहने लगी। 

उधर वरुण के पापा जी भी अपनी नौकरी से सेवानिवृत हो गए और घर पर बैठ गए। बस क्या था।  महीने के अंत में पेंशन मिलती थी और उसी पेंसन के पैसे से वरुण के पिता अपनी जेब खर्च और दूसरे खर्चे का वहन करने लगे।  इसी बीच वरुण को एक बेटा हुआ जिसमे वरुण ने खूब धूम धाम से उसके बेटे के जन्म लेने के उपलक्ष में काफी पैसे खर्च किया , सब जगह मिठाइयां भेजवायी।  

धीरे धीरे वरुण और उसकी बीवी का ध्यान अपने बच्चे के लालन पालन में लग गया और घर में बूढ़े माता पिता के तरफ से ध्यान हटने लगा।  लेकिन कहते हैं न माँ बाप अपनी औलाद की बहुत सी गलतियों को नजर अंदाज कर देते हैं और ये कह देते हैं कि लगता है मेरा बेटा आजकल काम के तनाव में रहता है इस लिए वो कुछ परेशान सा रहने लगा है।

यूँ कहें तो वरुण के माता पिता को अब ये अहसास होने लगा कि सच में अरुण और उसकी बीवी उन्हे नजर अंदाज करने लगे हैं। तब वे लोग धीरे धीरे निराशा का शिकार होने लगे। ये सारी चीजें उन्हे अंदर से कुरेदन लगीं और वे लोग विकार के शिकार हो गए। वरुण क्या करे। एक तरफ माँ बाप जिन्होंने वरुण को पैदा किया पाला पोसा और पढाया लिखाया तो दूसरी ओर उसकी बीवी जिसके साथ अग्नि को साक्षी मान कर सात फेरे लिए थे। वरुण के लिए यह एक अग्नि परीक्षा से कम नही था। 

 वरुण के पिता की भी तबियत अब ठीक नही रहती थी। वो बीमारी से हमेशा परेशान रहते थे। उनको बार बार डॉक्टर के पास ले जाना पड़ता था जो कि वरुण के संभव नही था । वरुण अपने दफ्तर में भी घर की परेशानियों को सोच सोच कर खुद परेशान रहने लगा। वो चाह कर भी अपनी मम्मी और अपनी बीवी के झगड़े में कुछ नहीं बोल पाता था। बोलता तो किसकी तरफ से बोलता। एक तरफ बीवी है तो दूसरी तरफ माँ। दोनो ही अपने हैं। 

वरुण की मम्मी पापा आपस में बातें करते थे कि लगता है बहू हमें घर में देखना नही चाहती है। इस लिए बात बात पर झगडा करने लगती है। और ठीक से बात भी नही करती है। 

वरुण सुबह उठ कर सुबह की दिनचर्या के बाद अपना दोपहर का भोजन लिया और अपने बच्चे को अपने मोटर साइकिल पर बैठा कर उसे उसके स्कूल में छोड़ कर अपने ऑफिस चला जाता था। 

अब वरुण के माता पिता को ये लगने लगा कि वाकई वरुण ने उन्हे नजरंदाज करना शुरू कर दिया है। उसकी बीवी तो पहले से ही अपने सास से नहीं बनती थी। वरुण के पिता बीमार चल रहे थे उस पर से घर के ऐसे माहौल से ऊब गए थे एक दिन अचानक से तबियत बिगड़ी और वे चल बसे। कुछ दिन तक तो घर शांत रहा लेकिन फिर बाद में जैसा का तैसा। 

अब वरुण अपने माँ और बीवी के झगड़े से काफी परेशान हो गया था। एक दिन वरुण की माँ किसी काम से बाहर गयी थी। 

उनको एक बृध् महिला मिली। जो किसी काम से वो भी वही आई थी। दोनो में धीरे धीरे जान पहचान हो गयी। अब वरुण की माँ जब भी वहाँ जातीं थी। वह महिला उनको वहाँ मिलती थी। बातचीत के दौरान उस महिला ने बताया कि वो वृधाश्रम में रहती हैं। दरअसल उस महिला ने बताया कि उसका बेटा ही उसको वृधाश्रम में छोड़ गया है। महिना के हर दस तारीख को वह आता है और अपनी माँ को कुछ पैसे दे जाता है। उस महिला की ये बात वरुण की मां को पसंद आ गयी। 

अब क्या वरुण की माँ को घर पर देख रेख करने वाला भी कोई नही था क्योंकि वरुण की बीवी उसकी माँ को देखना नही चाहती थी। एक दिन फिर घर में लफड़ा हुआ तो वरुण की माँ ने वरुण से बोला कि बेटा एक बात मै कई दिनों से कहना चाह रही हूँ लेकिन हिम्मत नही जुटा पा रही हूँ। वरुण ने बोला कि बताओ मां । 

उसकी मां बोली कि बेटा मुझे " वृधाश्रम " में भेजवा दो । वरुण अपनी मां के तरफ देखते रह गया उसका मुँह खुला का खुला रह गया। 

उसकी मां बोली हाँ बेटा मुझे वहीं भेज दो मै वहाँ पर चैन से रहूँगी। कम से कम दो वक्त की रोटी तो चैन से खाऊँगी और चैन की नींद सोऊँगी। 

यह सब सुनकर वरुण की आँखें भर आईं और वह रोने लगा। बोला कि मां मेरे रहते तुझे वृधाश्रम में रहने की कोई जरूरत नहीं। मै तुम्हारा ख्याल रखूँगा। तुझे कहीं जाने की जरूरत नहीं। 

उसकी मां ने समझाया। बेटा मै वृधाश्रम में ही तो जा रही हूँ। कहीं दूर थोड़ी। और फिर मै कहीं भी रहूँ मेरा प्यार और आशीर्वाद हमेशा तेरे उपर रहेगा। मै नही चाहती कि मेरे चलते तुम और तुम्हारी बीवी में झगडा हो। मै उस झगड़े का कारण बनू। 

इसलिए तुम मुझे खुशी खुशी वृधाश्रम में जाने की इजाजत दे दे बेटा। 

वरुण इजाजत दे भी तो कैसे। इज्जत का सवाल है। लोग क्या क्या बोलेंगे। इस बार वरुण की मम्मी वरुण पर हावी हो गयी और वरुण को मना लिया। वरुण की बीवी को इससे कुछ मतलब नही था कि उसकी मम्मी घर पर रहे या वृधाश्रम में। 

खैर! वरुण अपनी मम्मी को उनके सामान के साथ वृधाश्रम में छोड़ आया। वरुण महीने में एक बार अपना मम्मी से मिलने जाया करता था और उस दिन अपनी माँ को कुछ पैसे दे दिया करता था। 

कुछ दिन तक तो वरुण की माँ को वृधाश्रम में अजीब सा लग रहा था लेकिन उन्होंने उन हालातों से समझौता कर लिया और उसके अनुकूल अपने आप को ढाल लिया। 





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