विद्यार्थी जीवन एक सुनहरा जीवन होता है

 दोस्तों ! इस दुनिया में हर इंसान जो जन्म लिया है वो कभी न कभी विद्यार्थी रहा होगा। विद्यार्थी जीवन एक दम से चिंता मुक्त जीवन होता है । एक विद्यार्थी रोज सुबह स्कूल जाना मन लगा कर पढ़ाई करना। दोस्तों के साथ खूब मस्ती करना। खेल कूद करना किसी भी चीज या बात बात पर दूसरों से भिड़ जाना कभी खुद के लिए तो कभी जिगरी दोस्त के लिए। 

कभी कभी अपने स्कूल के दिन याद आते हैं तो मन में ये ख्याल आता है कि काश वो दिन वापस आ जाते। लेकिन ये तो दुनिया और जीवन की रीत है कि जो बीत गया वो बीत गया। वो दौर अब वापस कभी नहीं आयेगा लेकिन उसको याद कर कर के बचपन की यादों को ताजा कर लेते हैं। ये पता होते हुए कि आज के जीवन में उन यादों का कोई महत्व या अस्तित्व नहीं है लेकिन हमने वो जिंदगी जिए हैं तो उसको याद करके अपने दिलों दिमाग को ताजा कर लेते हैं । घर के पास ही एक कॉन्वेंट स्कूल था जिसमें शुरुवाती पढ़ाई किए। उसके बाद जैसे जैसे क्लास ऊंचा होता गया हम घर से दूर जाने स्टार्ट कर दिए। लेकिन बचपन की शैतानी कम नहीं हुई। रोज कोई न कोई शरारत कर ही देते थे और घर पर रोज किसी न किसी की शिकायत आ ही जाती थी। मां पापा के पास और फिर उसके बाद हमारी पिटाई होती थी। कभी कभी तो कोई झूठी शिकायत कर देता था तब भी हम बेवजह पीट जाते थे क्योंकि हमारी छवि वैसी ही बन गई थी शरारती नंबर वन।लेकिन पिटाई खाने के बाद हमारी आवभगत बहुत होती थी। कभी कभी तो इतने बहाने बना कर काफी देर तक रोते थे कि उसके बाद जो कहें वो मिलता था। जो भी मिठाई खाने को जी करता वो खाने को मिलते थे। 

कभी खेल खुद कर आते थे तो काफी थक जाते थे तो मम्मी हाथ पाँव दबा देती थी। और उस वक्त कब नींद आ जाती थी पता ही नही चलता था। एक बार मेरे एक दोस्त से मेरी लडाई हो गयी जिसमे उसका सर फट गया। काफी खून निकले थे। मै घबरा गया था। सबसे पहले तो क्लास टीचर ने मेरी खूब धुनाई की फिर प्रधानाध्यापक ने भी खूब पिटाई की मेरी। खैर उस लड़के की मरहम पट्टी मैंने ही अपने पैसे से कराई और फिर जब घर गया तो घरवाले भी बहुत पिटाई किये मेरी। 

लेकिन बाद में जब मैंने सब बातें घरवालों को बताई तो  घरवाले बहुत पछताए क्योंकि सारी गलती मेरे उस दोस्त की थी। अगले दिन उस दोस्त ने भी क्लास में कबूला कि सारी गलती उसकी थी। ये सब सुनने के बाद मेरी क्लास टीचर भी बहुत अफसोस कीं और प्रिंसिपल साहब भी बहुत दुखी हुए और सबने मुझे समझाया कि कोई बात नहीं गलतफहमी में भी कभी कभार गलती हो जाती है। खैर! टीचर और प्रिंसिपल ने मिलकर हम दोनों दोस्तों ने हाथ मिलाया और एक दूसरे से माफी मांगी। और उस मसले को वही भूल गए। लेकिन चूंकि वो बचपन और विधार्थी जीवन के दिन थे तो आज कभी कभार याद आकर उन यादों को ताजा कर देता है। आज जब भी उस दोस्त से मिलता हूँ तो हम दोनो उस पल को याद करके भावुक हो जाते हैं। 

एक कहानी बता रहा हूँ जब एक दोस्त कुछ खाने की चीजें बाजार से खरीद कर लाया था हम सबने मिल कर उससे छीन लिया। वो अकेले बेचारा क्या करता। था तो दोस्त ही और दोस्तों से कितना लड़ता। दोस्तों के साथ सब कुछ माफ रहता है। खैर वो काफी रोया गिरगिरया फिर जाके बात तय हुई कि वो उसमें से हमें भी खाने को देगा। तब हमन उसे दे दिया और फिर उसने उसमें से हम सबको खाने को दिया। और हम सब खा ही रहे थे एक साथ कि अचानक से हमारी क्लास टीचर आ गयीं। अब क्या था हम डर गए। लेकिन क्लास टीचर बहुत ही अच्छी थी और बोलीं की जल्दी खा कर सब क्लास में आ जाओ। हम लोग क्लास में गए और पढाई की। स्कूल में हमारा रोज का काम था कि सुबह स्कूल में जाने के बाद सबसे पहले प्रार्थना होती थी उसके बाद सब अपने अपने क्लास में। फिर विषयानुसार पढाई होती थी। कभी टीचर हमस ही कोई सवाल पूछ लिया करते थे। जवाब देने के बाद कुछ देर तक सोचते थे कि पता नहीं जवाब सही है या गलत। लेकिन जब टीचर के मुँह से ये बात सुनते कि जवाब सही है तब उसके बाद जो कॉन्फिडेंस लेवल ऊँचा होता था समझो आसमान छू लिया हो। 

हर साल दिसंबर के महीने में स्कूल में एक पार्टी होती थी, जो छात्र स्कूल से परित्याग करके जाते थे उनको फेयरवेल पार्टी दी जाती थी। उस दिन स्कूल के सारे कर्मचारी शिक्षक और विधार्थी एक साथ खाना खाते थे। बहुत ही अच्छा लगता था। लेकिन जब सिनीयर सहपाठी लोग अगले दिन से स्कूल नहीं आते थे तो बहुत ही बुरा लगता लेकिन क्या कर सकते अब उन्हे भी दूसरे स्कूल में जाना है ऊँचे क्लास में चले गए। 

और ऐसा करते करते एक समय ऐसा आया जब हम भी सिनीयर बन के उस स्कूल से विदा हो लिए और हमारे लिए भी फेयरवेल पार्टी रखी गयी थी। स्कूल को छोड़ते वक्त स्कूल में बिताए गए एक एक पल आँखों के सामने उभर कर आ रहे थे। आँखें नम हो जाती थी लेकिन क्या करे जाना तो ही क्योंकि अब हम ऊँचे क्लास में जो जा चुके थे। 

अगले दिन भी रोज की तरह समय पर नास्ता पानी करके तैयार होकर स्कूल को चल दिये लेकिन क्या था अब मंजिल कहीं और थी। क्योंकि हमारे स्कूल बदल गए थे। कभी कभी पुराने स्कूल में चले जाते थे घूमते हुए। पुरानी बातें ताजा हो जाती थी। 

अब हम नये स्कूल में जा चुके थे जो उस जिले का नंबर वन उच्च विद्यालय माना जाता था। दूर दूर से छात्र पढ़ने आते थे। अब क्या नये सहपाठियों के साथ अपने को घुल मिल कर उनसे दोस्ती करनी है और पढाई करनी है। हम जैसे जैसे ऊँचे क्लास में बढ़ते गए। हमारी समझ और जिम्मेदारी, बढ़ती गयी। 

खैर कुछ ही दिनों में नये नये दोस्त बन गए। और धीरे धीरे उनके साथ हम घुल मिल गए। 



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